आखिरी सांसे गिनती इस औरत को जिसे कोई वैद्ध भी ना बचा सका उसे बचाया प्रभु ने

||jai Guruji||

मनुष्य के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जिनको सहते हुए यही कहा जा सकता है कि संभवतः ईश्वर की यही इच्छा थी।

मुझे नया जीवन प्रदान करने के लिए मैं सदा गुरूजी की आभारी रहूंगी। गत घटनाओं का अवलोकन करते हुए अब मैं उनका बोध कर सकती हूँ, पर उस समय कारण मेरी समझ से बाहर थे। दुर्भाग्य मेरी नस नस में भरा हुआ था, मुझे अत्यधिक पीड़ा थी। मेरे जीवन का हर अंग भौतिक और मानसिक व्यथा से परितप्त था। यद्यपि गुरूजी ने आकाशदीप बन कर मेरे जीवन में प्रवेश किया था, मुझे अपने अन्धकार और निराशा के अतिरिक्त कुछ देखा हुआ नहीं था।

ब्रिटेन के मेनचेस्टर शहर में जन्म लेकर मैं जन्मजात अस्थमा, विसर्प (एकजिमा) और ह्रदय में छिद्र जैसे रोगों से पीड़ित थी। मेरा बचपन मेरे अभिभावकों और स्वयं मेरे लिए अति कष्टदायी रहा था। तथापि स्वास्थ्य के सुकर्मों के कारण मेरी जीवशक्ति अपराजेय थी और मुझे अपने साथियों से अधिक सहन करना पड़ता था। अपने क्लेशों के कारण मुझे बचपन में ही छोटे – मोटे दुखों का सामना करना आ गया था। मुझे अपने दस वर्ष पूरे होने की शंका थी पर भाग्य ने साथ दिया।

दूसरी ओर मेरे माता पिता सदा संदिग्ध अवस्था में रहते थे क्योंकि हृदयरोग विशेषज्ञ ने मेरे बारे में भयभीत करने वाला चित्रण किया था। स्वस्थ और प्रसन्न रहकर, जीवन के सब आनंद उठाते हुए मैंने अपने किशोरावस्था के वर्ष बिताये।

बाईस वर्ष की आयु में विवाह के उपरान्त मैं दिल्ली आ गयी। दुर्भाग्यवश दुखों के घनघोर बादल पुनः मेरे जीवन में आ गये। हर बदलते मौसम के साथ मेरा दमा अति कष्टदायी हो जाता। हर बार मुझे चिकित्सालय में दाखिल करा कर स्टेरॉइड इंजेक्शन दिये जाते थे।

दमे से बचने के मेरे सब प्रयत्न विफल होते देख कर मैं हताश हो गयी। 1997 में मुझे दमे का सबसे कठोर, जानलेवा आक्रमण हुआ और अंततः मैंने हार मान ली। मुझे याद है कि मैं अपने ह्रदय में प्रार्थना कर रही थी कि यह अंतिम हो क्योंकि मैं और सहन नहीं कर सकती थी। उन्हीं दिनों मुझे पूर्ण शरीर पर भयानक त्वचा रोग हो गया। बओप्सी से पता लगा कि वह कर्कट रोग (कैंसर) है। चूँकि इससे मेरे परिवार को आघात पहुंचता यह समाचार मैंने उनको नहीं दिया। मेरे जीने की समस्त आशा समाप्त हो चली थी; मेरा आगे का मार्ग बंद हो चुका था।

अचानक उस अँधेरी रात्रि में गुरूजी ने अपनी दिव्यज्योत प्रज्ज्वलित करी। हर बार उनके पहले दर्शन की बातें याद करते हुए मुझे अपने मन में उठी सब भावनाएं याद आ जाती हैं। सौभाग्य से उस दिन वह अकेले बैठे हुए थे जब मैं अपनी एक मित्र, जिसने उनसे मिलने का आग्रह किया था, के साथ उनके यहाँ पहुंची। उनकी उपस्थिति में मैं भाव-विह्वल हो गयी। मुझे उस जीवन भर भटकते हुए शिशु की भांति लगा जिसे अन्त में अपनी माँ का आश्रय और सुरक्षा मिल गयी हो। उन्होंने उसी समय मुझे अपना संरक्षण प्रदान किया। यथार्थ में मैंने पहली बार पवित्र प्रेम का अनुभव किया था; उसमें न कोई प्रतिबन्ध था, न ही कोई अन्य चाहत। मुझे घर के सदस्य की भांति उन्होंने प्रतिदिन संगत में आने को कहा। मौसम चाहे जैसा भी हो मैं संगत में पहुँच कर उनके अनगिनित भक्तों में बैठ जाती थी।

उन दिनों मुझे असहनीय वेदना रहती थी; मेरी त्वचा से रक्त और पीप (पस) का स्त्राव बना रहता था। मानसिक रूप से विचलित होने के कारण मुझे समूह में घुटन भी होती थी।

जैसे जैसे समय बीतता गया गुरूजी ने दया कर मेरा आंतरिक परिवर्तन आरम्भ कर दिया। मेरे मन से द्वेष और वैर के भाव समाप्त हो गये और मैंने अपनी इस दशा से समझौता करना सीख लिया। क्योंकि अब मैंने उसे स्वीकार कर लिया था, मैं उस अवस्था में भी संतुष्ट थी – रोग समाप्त हो जाएंगे, ऐसा विश्वास मुझे नहीं था।

मात्र गुरूजी का साथ और उनकी ऊर्जा को ग्रहण कर मेरी अन्तःशक्ति बढ़ गयी। मुझे इससे अधिक आशा भी नहीं थी। मुझे शांति मिल गयी थी। उनके सान्निध्य में डूबते हुए मुझे आत्मिक जागरण का आभास होने लगा। मुझे उनसे ऐसा प्रेम प्राप्त होता था जिसका मैंने पहले कभी आनंद नहीं लिया था। उनका प्रेम ऐसा पवित्र और पावन था जिसका कहीं कोई पर्याय नहीं मिल सकता। बिना किसी नागा के, हर संध्या को, मैं उनकी ओर प्राकृतिक सहजता से खींची चली जाती थी।

उस महत्त्वपूर्ण दिन उन्होंने सामने अपने पास बुलाया और पंजाबी में कहा – जिससे मैं अनभिज्ञ थी – कि उन्होंने मुझे नींबू की भांति निचोड़ दिया है और अब वह मेरा रोग दूर करेंगे। यह देखने के लिए कि मैं उनकी कृपा के योग्य हूँ अथवा नहीं, उन्होंने मेरे धैर्य का परीक्षण कर लिया था।

उस दिन ह्रदय में आशा और उमंग भरे हुए मैं घर पहुँची। पिछले कुछ महीनों में, जब मेरी त्वचा तप्त रहती थी, मैं अपना प्रतिबिम्ब देखने से कतराती थी। शीशे में अपना दयनीय चेहरा देखना मेरे लिए असंभव था।

जीवन में मोड़ तब आया जब गुरूजी ने अपना शाश्वत वरदान देकर मुझे शीशे में देखने का साहस करने को कहा। मुझे साहस की अति आवश्यकता थी – मेरा चेहरे थोड़ा भिन्न तो अवश्य था। किन्तु कुछ सप्ताह बीतने पर, मुझे अंतर का पता लगने लगा। एक नयी मैं, अपने से अपरिचित। मैं गुरूजी की कृपा से परास्त हो गयी थी। मैं उनकी रोग समाप्ति की क्षमता की कायल हो गयी थी। उनके लिए मेरे प्रेम और आदर भाव और अधिक प्रबल हो गये।

मौसम बदल कर आते गये पर मुझे फिर कभी अस्थमा नहीं हुआ। मैं दिल्ली की प्रदूषित वायु में किसी भी अन्य नागरिक के समान श्वास लेती रही। गुरूजी ने मुझे नवजीवन प्रदान किया था और यह भी बताया कि उनके हस्तक्षेप के बिना मेरा और जीना असंभव था। उसी वर्ष के प्रारम्भ में मैं एक ज्योतिषी से भी मिली थी जिसने मेरी अल्पायु की भविष्यवाणी करी थी।

मुझ में हुए परिवर्तन को शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए अत्यंत चुनौती भरा कार्य है। मैं इतना तो कह ही सकती हूँ कि उन्होंने मुझे केवल भौतिक ही नहीं, अपितु आंतरिक रूप से भी परिवर्तित कर दिया था। एक लम्बे अंतराल के पश्चात्, शब्दों को अभिव्यक्ति दें तो, मुझे अपनी त्वचा में अपना शरीर अच्छा लगने लगा।

गुरूजी यदा कदा अपने भक्तों का परीक्षण करते रहते हैं। मानव अपनी स्वार्थी प्रकृति के कारण कामना पूर्ण होने पर पिछली बातें भूल जाता है, पर गुरूजी की कृपा तो जन्म जन्मान्तर, सदा बनी रहती है। यह इस सन्दर्भ से स्पष्ट हो जाएगा।

गुरूजी ने मुझे अपने चित्र के समक्ष प्रतिदिन एक मोमबत्ती जलाने को कहा था। एक दिन, मेरे विस्मय से, आधी डिबिया समाप्त होने के बाद भी वह नहीं जली। आवेश में आकर मैं स्नानागार में चली गयी, बाहर आई तो देखा कि मोमबत्ती जल रही थी। मैं चकित रह गयी।

उसी सांझ को गुरूजी को धन्यवाद प्रकट करने के लिए मैं उनके दर्शन के लिए गयी, यद्यपि वह मेरा जाने का निर्दिष्ट दिन नहीं था। मैं जैसे ही उनके चरण स्पर्श करने के लिए झुकी उन्होंने धीमे से अपनी दयालु आवाज़ में प्रश्न किया कि अंत में मोमबत्ती जली या नहीं। तब मुझे आभास हुआ कि मैं उनसे दूर हो रही थी, वह तो सदा मेरे साथ थे। मैं उनकी हार्दिक आभारी हूँ और हर क्षण उनकी कृतज्ञ रह कर जीवन व्यतीत करना चाहूंगी।

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